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सुशांत सुप्रिय की कविता

सुशांत सुप्रिय की कविता

नफ़ीस और मैं और 2014 का चुनावी साल
                   
बाबरी मस्जिद के ध्वंस
या गुजरात दंगों के बावजूद
धर्म-निरपेक्ष था हमारा देश --
मैं और मेरा मित्र नफ़ीस
यही पढ़ते-सुनते हुए बड़े हो रहे थे

वह सन् 2014 का चुनावी साल था
लुटी हुई हवाओं में अपरिचय की
तीखी दुर्गंध थी

देखते-ही-देखते
डर ने एक भयावह शक़्ल
अख़्तियार कर ली थी
उस शक़्ल में से गूँजती थी
तेज़ाबी चिंघाड़ें
जिससे सारी तितलियाँ मर जाती थीं
सारे फूल मुरझा जाते थे

यह जंग हम हार गए हैं --
चुनाव-परिणाम की घोषणा
के बाद उदास हो कर
तुमने कहा था नफ़ीस

वह सन् 2014 का चुनावी साल था
फ़िज़ा में मौत की सड़ाँध फैली हुई थी
और मैं तुम्हारी आँखों में
धर्म-निरपेक्षता की इमारत को
ढह कर खंडहर बनते हुए देख रहा था ...